09/08/2026
बात मई, 2002, की है, मेरा अमीनाबाद से लखीमपुर खीरी के लिये स्थानांतरण हुआ था और जब मैं जोईन करने पहुँचा तो बाजपेई जी पूर्व शाखा प्रबंधक को मुझे रिलीव करना था ।अगले दिन हम दोनो प्रबंधक के केबिन में बैठे थे कि अचानक एक बहुत ही स्मार्ट युवक की केबिन में एंट्री होती है, अंग्रेज़ी में फ़ें फ़ें करता हुआ बहुत ग़ुस्से में ! तभी बाजपेई जी ने मेरी ओर इशारा कीया कि -
“मैं तो जा रहा हुँ , मेरा ट्रान्स्फ़र हो चुका है, अब आप इनसे बात कीजिएगा ।”
ज्यूँ ही उस युवक ने मेरी ओर देखा, मैने उसको कल आने को बोला, और वह बहुत दिनो से लटकाने के लिये बड़बड़ाता हुआ चला भी गया ।
अगले दिन वह आते ही फिर अंग्रेज़ी, और सामने की कुर्सी पर बैठने का पर्यास करने लगा । मैने उसको मना कीया कि -
“पहले खड़े से पूरी अंग्रेज़ी बोल दो, जब यह लग जाये कि मैं तुम्हारी इंग्लिश से इम्प्रेस हो चुका हुँ तो बैठ जाना ।”
अब शुक्ला जी को ना बैठते बन रहा था ना अंग्रेज़ी बोलते। तभी मैने उसकी फ़ाइल मँगवाई, मैने पूछा कि -
“पड़ाई क्यूँ छोड़ी ?”
उसका जबाब था -
“ पापा की डेथ हो गई थी इसलिये।”
“पापा क्या करते थे ?”
“सर लोकल प्रशासन में ऑफ़िसर थे ।”
“ तो माता जी को तो पेन्शन मिलती होगी ?”
“यस सर “
“ पर आपने एफीडेविट में तो लिखा है कि परिवार में किसी की कोई आय नही ।”
“ सर दलाल ने भराया है, हम लोगों ने तो सिर्फ़ साइन किये है ।”
“ मालूम है कि इसमें दो लाख के लोन जो बिना ज़मानत वाले है उनके लिये इनकम कराईटेरिया है ।”
“सर नही मालूम ।”
“आप तो इस स्कीम के पात्र ही नहीं है मिस्टर शुक्ला, और कल आपने आसमान सिर पर उठा रखा था, क्या कुछ नहीं बोल रहे थे आप ?”
अब शुक्ला जी को काटो तो खून ना, एक दम सन्नाटे में ।
“सर मैने तो दुकान भी किराये पर ले ली है”
“पर आपको इसमें तो लोन मिलेगा ही नहीं, हाँ जनरल लोन दे सकते है आप कल अपनी माता जी को ले आना ।”
अब शुक्ला जी को थोड़ी सी जान में जान आयी, और बोले -
“ सर थैंक यू,”
मेरी लेफ़्ट साइड से मेरी कुर्सी की तरफ़ लपके और झट से पैर छू कर जाने की इजाज़त माँगने लगे, अब अंग्रेज़ी ग़ायब और बेहद ही सुसंस्कारिक भाषा शुरू ।
अगले दिन वह लड़का अपनी माता जी के साथ फिर से उपस्थित था। उनकी माता जी को मैने बताया कि आपकी ज़मानत पर मैं जनरल लोन देता हूँ, अगर आपके बेटे ने डिफ़ॉल्ट कीया तो आपकी पेन्शन का कुछ हिस्सा अटैच कर दूँगा। उनकी हाँ मिलने पर उस लड़के की फ़ाइल को दो लाख से ऊपर की बनवाकर माता जी की ज़मानत लेकर उसकी दुकान को लोन कर दीया गया था ।
जब तक मैं उस शाखा में रहा, उसकी दुकान भी ठीक चल रही थी रेडीमेड गारमेंट की और खाते में किस्तों की अदायगी भी बहुत ही समयबध रूप में आ रही थी ।
शुक्ला जी मेरे बहुत बड़े मुरीद थे, शाखा में आने पर मनाही करने पर भी पैर छूना नहीं भूलते थे। बहुत खुश रहते थे, मेरे ट्रान्स्फ़र पर मई 2005, में बहुत दुःखी दिख रहे थे ।
वह लड़का बहुत एनर्जेटिक दिखता था, बाद के काल खण्ड में क्या हुआ मुझे मालूम नहीं, लेकिन लक्षण उसके बड़े आदमी बनने के थे बशर्ते ग़लत संगति में ना पड़ गया होगा ।
ख़ैर शुक्ला जी कंहा है, किस हाल में है, मुझे नहीं मालूम लेकिन मेरी शुभ कामनायें उस युवक के साथ है। ईश्वर उसको तरक़्क़ी दें, और उसके अन्दर सकरात्मकता बनायें रखें ऐसी मेरी मनोकामना है एक संघर्षशील युवक के लिये।
मेरा सभी नये शाखा प्रबन्धकों और लोन विभाग से सम्बंधित अधिकारियों को सीधा सा और बहुत ही सटीक सा एक मशवरा है कि किसी भी आवेदन पत्र पर सभी नेगेटिव और पॉज़िटिव पक्षों पर मनन करने के पश्चात यह तय करें कि अगर पॉज़िटिव का भाग 51% या अधिक प्रतीत हो तो किसी भी सूरत में आवेदन की स्वीकृति पर विचार करना माँगता है। कम से कम आप किसी बेरोज़गार को रोज़गार प्रदान करने और राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्ति भूमिका दर्ज कर रहे हो। हो सकता है वही नौजवान आने वाले कल का बहुत बड़ा बिज़्नेसमेन हो। मैने मुम्बई में अपनी पोस्टिंग के दौरान बहुत सारे बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट को सुना और देखा है। उनके संघर्ष के दिन और बैंकों के योगदान के कारण आज उन सभी का भारत ही नहीं बल्कि अन्तराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रोडक्ट की बहुत बड़ी पहचान है। ना जाने कौन आने वाले कल का धीरूभाई अम्बानी हो, जो अपने राष्ट्र की प्रतिष्ठा को विश्व पटल पर रखने में कामयाब हो। बस आवश्यकता है सही चुनाव, सही वक्त पर निर्णय और जब भी मुलाक़ात हो उसको लोन खाते के बारे में एजुकेट करके बड़े सपने दिखाने की ताकि बैंक खाते को सपने में भी ख़राब करने की नियत ना पनपने पायें । यह ज़िम्मेदारी केवल और केवल बैंकर को निभानी चाहिये, और अच्छे खातेदारों की चैन प्रक्रिया से आगे बढ़ना चाहिये, ताकी आपके फ़ोल्ड में बेहतरीन लोगों की कड़ियाँ जुड़ती जाये और बैंक का व्यवसाय अनवरत रूप में बढ़ता जाये ।
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अपनी बैंक रिटाइर्ड लाइफ को मैं अब पूर्ण आनंद के साथ जी रहा हूँ और जेबीपी मिशन के तहत एक सामाजिक हॉबी के रूप में भी विकसित किया है मैंने, जिसमें मैं गरीब परिवारो के होनहार छात्रों के हितार्थ देश भर के जेबीपीयन अर्थात् सदस्यों द्वारा निरन्तर प्रदत्त धनराशी को प्रखर बुद्धि के संघर्षशील छात्रों तक पहुंचाना और उनको मोटीवेट करना अपना रुचिकर विषय अर्थात् हॉबी बना चुका हूँ और मुझको उसमे ही असीम आनंद की अनुभूति होती है ।
संघर्शशील परिवारों के होनहार प्रकार के छात्रों के हितार्थ जेबीपी फ़ाउण्डेशन में सैकड़ों नेक प्रकार के लोग अपने वेतन और पेन्शन में से अपना योगदान भेज रहे है ताकि देश के गरीब परिवारों की प्रखर प्रतिभाओं की पड़ाई की रक्षा की जा सके क्यूँकि जेबीपी फ़ाउण्डेशन की स्थापना ही इस प्रकार के छात्रों के हितों की रक्षा के लिये की गई है । कोई भी पाठक वर्ग में जो भी अपने आपको सक्षम समझता हो , इस मिशन का सदस्य बन सकता है, आवश्यकता है केवल मैसेंजर के माध्यम से हमे संपर्क करने की, फिर हमारी टीम पूर्ण प्रक्रिया से अवगत करवा देगी ।
अर्थात
परहित सरिस धर्म नहीं भाई,
परपीड़ा सम नहीं अधमाई ।
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दान न विद्या से बड़ा, इस दुनियाँ में कोय,
जीवन में ख़ुशियाँ मिले, काज सफल सब होय।
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नोट-: पाठकों के संज्ञान हेतु हमारा मिशन अभी तक गत सात वर्षों के अल्प काल में लक्ष्य परक 917 छात्रों को 25.40 लाख की राशी वितरित करने में सफल हुआ है और यह कार्य निरंतर जारी है अर्थात इस प्रकार के किसी भी छात्र को देश के किसी भी कोने से निराश नहीं किया जाएगा यह हमारा संकल्प है ।
कृपया पाठकों को इस प्रकार के छात्रों की कठिनाइयाँ देखनी और सुननी चाहिए -
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https://youtu.be/5YOUteSRvV4?si=bxGH3KZejPTXJies
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https://youtu.be/lOlP7xj8Cbo?si=nfvVr7e6D0wNsXkz
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धन्यवाद
एस एन शर्मा
संस्थापक जेबीपी फाउंडेशन