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I was very busy since last few months. So sorry.
07/06/2017

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I don’t know if I can answer this fully, but if Buddhism is so universal then EVERYBODY would follow it. I think it is u...
19/02/2017

I don’t know if I can answer this fully, but if Buddhism is so universal then EVERYBODY would follow it. I think it is universal in terms of the Dharma, which I don’t know fully either, but enough to know that it is mostly common sense. That is, it could be implemented by any ethnic group regardless of religious origin. Because the basis of Buddhism is mainly karma, when one explain karma, they tend to make more sense. One may follow the Dharma without having to be Buddhist because it does not conflict with the individual’s belief system. The Dharma could be used to outline life’s activities. Take for example, the Five Precepts. They are no drinking, killing, cheating or lying, engaging in sexual misconduct, and stealing. These are pretty common values any person is endowed with from birth, no matter their origin. People could follow these rules without having to be Buddhist. In that sense, Buddhism is universal.

कृपया अवश्य पढ़ें। .बुद्ध के अंतिम वचन हैं Please must read. Buddha's last words : अप्प दीपो भव। अपने दीए खुदबनना। और तु...
01/02/2016

कृपया अवश्य पढ़ें। .बुद्ध के अंतिम वचन हैं Please must read. Buddha's last words : अप्प दीपो भव। अपने दीए खुदबनना। और तुम्हारी रोशनी में तुम्हें जो दिखायी पड़ेगा, फिर तुम करोगे भी क्या-आस्था न करोगे तो करोगे क्या? आस्था सहज होगी। उसकी बात ही उठानी व्यर्थ है।

बुद्ध का धर्म विश्लेषण का धर्म है। लेकिन विश्लेषण से शुरू होता है, समाप्त नहीं होता वहा। समाप्त तो परम संश्लेषण पर होता है 1 बुद्ध का धर्म संदेह का धर्म हैं। लेकिन संदेह से यात्रा शुरू होती है, समाप्त नहीं होती। समाप्त तो परम श्रद्धा पर होती है।
हिंदुओं को भी लगा कि यह तो सारे आधार गिरा देगा धर्म के। और यही आदमी है, जिसने धर्म के आधार पहली दफा ढंग से रखे।

श्रद्धा पर भी कोई आधार रखा जा सकता है! अनुभव पर ही आधार रखा जा सकता है। अनुभव की छाया की तरह श्रद्धा उत्पन्न होती है। श्रद्धा अनुभव की सुगंध है। और अनुभव के बिना श्रद्धा अंधी है। और जिस श्रद्धा के पास आख न हों, उससे तुम सत्य तक पहुंच पाओगे?

बुद्ध ने बड़ा दुस्साहस किया। बुद्ध जैसे व्यक्ति पर भरोसा करना एकदम सुगम होता है। उसके उठने-बैठने में प्रामाणिकता होती है। उसके शब्द-शब्द में वजन होता है। उसके होने का पूरा ढंग स्वयंसिद्ध होता है। उस पर श्रद्धा आसान हो जाती है। लेकिन बुद्ध ने कहा, तुम मुझे अपनी बैसाखी मत बनाना। तुम अगर लंगड़े हो, और मेरी बैसाखी के सहारे चल लिए-कितनी दूर चलोगे? मंजिल तक न पहुंच पाओगे। आज मैं साथ हूं कल मैं साथ न रहूंगा, फिर तुम्हें अपने ही पैरों पर चलना है। मेरी रोशनी से मत चलना, क्योंकि थोड़ी देर को संग-साथ हो गया है अंधेरे जंगल में। तुम मेरी रोशनी में थोड़ी देर रोशन हो लोगे, फिर हमारे रास्ते अलग हो जाएंगे। मेरी रोशनी मेरे साथ होगी, तुम्हारा अंधेरा तुम्हारे साथ होगा। अपनी रोशनी पैदा करो। अप्प दीपो भव!
बुद्ध धर्म के पहले वैज्ञानिक हैं। उनके साथ श्रद्धा और आस्था की जरूरत नहीं है। उनके साथ तो समझ पर्याप्त है। अगर तुम समझने को राजी हो, तो तुम बुद्ध की नौका में सवार हो जाओगे। अगर श्रद्धा भी आएगी, तो समझ की छाया होगी। लेकिन समझ के पहले श्रद्धा की मांग बुद्ध की नहीं है। बुद्ध यह नहीं कहते कि जो मैं कहता हूं, भरोसा कर लो। बुद्ध कहते हैं, सोचो, विचारों, विश्लेषण करो, खोजो, पाओ अपने अनुभव से, तो भरोसा कर लेना।

दुनिया के सारे धर्मों ने भरोसे को पहले रखा है, सिर्फ बुद्ध को छोड़कर। दुनिया के सारे धर्मों में श्रद्धा प्राथमिक है, फिर ही कदम उठेगा। बुद्ध ने कहा, अनुभव प्राथमिक है, श्रद्धा आनुसांगिक है। अनुभव होगा, तो श्रद्धा होगी। अनुभव होगा, तो आस्था होगी।
बुद्ध ने कहा : मुझ पर भरोसा मत करना। मैं जो कहता हूं उस पर इसलिए भरोसा मत करना कि मैं कहता हूं। सोचना, विचारना, जीना। तुम्हारे अनुभव की कसौटी पर सही हो जाए, तो ही सही है।
Thanks to all.

Please must read. कृपया अवश्य पढ़ें।आज से पच्चीस सौ वर्ष पूर्व, जिस दिन बुद्ध का जन्म हुआ, घर में उत्सव मनाया जाता था। स...
01/02/2016

Please must read. कृपया अवश्य पढ़ें।

आज से पच्चीस सौ वर्ष पूर्व, जिस दिन बुद्ध का जन्म हुआ, घर में उत्सव मनाया जाता था। सम्राट के घर बेटा पैदा हुआ था, पूरी राजधानी सजी थी। रातभर लोगों ने दीए जलाए, नाचे। उत्सव का क्षण था! बूढ़े सम्राट के घर बेटा पैदा हुआ था। बड़े दिन की प्रतीक्षा पूरी हुई थी। बड़ी पुरानी अभिलाषा थी पूरे राज्य की। मालिक बूढ़ा होता जाता था और नए मालिक की कोई खबर न थी। इसलिए बुद्ध को सिद्धार्थ नाम दिया। सिद्धार्थ का अर्थ होता है, अभिलाषा का पूरा हो जाना।

पहले ही दिन, जब द्वार पर बैंड-बाजे बजते थे, शहनाई बजती थी, फूल बरसाए थे महल में, चारों तरफ प्रसाद बंटता था, हिमालय से भागा हुआ एक वृद्ध तपस्वी द्वार पर खड़ा हुआ आकर। उसका नाम था असिता। सम्राट भी उसे सम्मान करता था। और कभी असिता राजधानी नहीं आया था। जब कभी जाना था तो शुद्धोदन को, सम्राट को, स्वयं उसके दर्शन करने जाना होता था। ऐसे बचपन के साथी थे। फिर शुद्धोदन सम्राट हो गया, बाजार की दुनिया में उलझ गया। असिता महातपस्वी हो गया। उसकी ख्याति दूर-दिगंत तक फैल गयी। असिता को द्वार पर आए देखकर शुद्धोदन ने कहा, आप, और यहां! क्या हुआ? कैसे आना हुआ? कोई मुसीबत है? कोई अड़चन है? कहे। असिता ने कहा, नहीं, कोई मुसीबत नहीं, कोई अड़चन नहीं। तुम्हारे घर बेटा पैदा हुआ, उसके दर्शन को आया हूं।

शुद्धोदन तो समझ न पाया। सौभाग्य की घड़ी थी यह कि असिता जैसा तपस्वी और बेटे के दर्शन को आया। भागा गया अंतगृह में। नवजात शिशु को लेकर बाहर आ गया। असिता झुका, और उसने शिशु के चरणों में सिर रख दिया। और कहते हैं, शिशु ने अपने पैर उसकी जटाओं में उलझा दिए। फिर तब से आदमी की जटाओं में बुद्ध के पैर उलझे हैं। फिर आदमी छुटकारा नहीं पा सका। और असिता हंसने लगा, और रोने भी लगा। और शुद्धोदन ने पूछा कि इस शुभ घड़ी में आप रोते क्यों हैं?

असिता ने कहा, यह तुम्हारे घर जो बेटा पैदा हुआ है, यह कोई साधारण आत्मा नहीं है; असाधारण है। कई सदियां बीत जाती हैं। यह तुम्हारे लिए ही सिद्धार्थ नहीं है; यह अनंत-अनंत लोगों के लिए सिद्धार्थ है। अनेकों की अभिलाषाएं इससे पूरी होंगी। हंसता हूं, कि इसके दर्शन मिल गए। हंसता हूं प्रसन्न हूं? कि इसने मुझ के की जटाओं में अपने पैर उलझा दिए। यह सौभाग्य का क्षण है! रोता इसलिए हूं कि जब यह कली खिलेगी, फूल बनेगी, जब दिग-दिगंत में इसकी सुवास उठेगी, और इसकी सुवास की छाया में करोड़ों लोग राहत लेंगे, तब मैं न रहूंगा। यह मेरा शरीर छूटने के करीब आ गया।

और एक बड़ी अनूठी बात असिता ने कही है, वह यह कि अब तक आवागमन से छूटने की आकांक्षा थी, वह पूरी भी हो गयी; आज पछतावा होता है। एक जन्म

अगर और मिलता तो इस बुद्धपुरुष के चरणों में बैठने की, इसकी वाणी सुनने की, इसकी सुगंध को पीने की, इसके नशे में डूबने की सुविधा हो जाती। आज पछताता हूं लेकिन मैं मुक्त हो चुका हूं। यह मेरा आखिरी अवतरण है; अब इसके बाद देह न धर सकूंगा। अब तक सदा ही चेष्टा की थी कि कब छुटकारा हो इस शरीर से, कब आवागमन से आज पछताता हूं कि अगर थोड़ी देर और रुक गया होता.। इसे तुम थोड़ा समझो।

बुद्ध के फूल के खिलने के समय, असिता चाहता है, कि अगर मोक्ष भी दांव पर लगता हो तो कोई हर्जा नहीं

कृपया अवश्य पढ़ें। Please Must read.बुद्ध ऐसे हैं जैसे हिमाच्छादित हिमालय। पर्वत तो और भी हैं, हिमाच्छादित पर्वत और भी ह...
28/01/2016

कृपया अवश्य पढ़ें। Please Must read.बुद्ध ऐसे हैं जैसे हिमाच्छादित हिमालय। पर्वत तो और भी हैं, हिमाच्छादित पर्वत और भी हैं, पर हिमालय अतुलनीय है। उसकी कोई उपमा नहीं है। हिमालय बस हिमालय जैसा है। गौतम बुद्ध बस गौतम बुद्ध जैसे। पूरी मनुष्य-जाति के इतिहास में वैसा महिमापूर्ण नाम दूसरा नहीं। गौतम बुद्ध ने जितने हृदयों की वीणा को बजाया है, उतना किसी और ने नहीं। गौतम बुद्ध के माध्यम से जितने लोग जागे और जितने लोगों ने परम- भगवत्ता उपलब्ध की है, उतनी किसी और के माध्यम से नहीं।
बुद्ध के साथ मनुष्य-जाति का एक नया अध्याय शुरू हुआ। पच्चीस सौ वर्ष पहले बुद्ध ने वह कहा जो आज भी सार्थक मालूम पड़ेगा, और जो आने वाली सदियों तक सार्थक रहेगा। बुद्ध ने विश्लेषण दिया, एनालिसिस दी। और जैसा सूक्ष्म विश्लेषण उन्होंने किया, कभी किसी ने न किया था, और फिर दुबारा कोई न कर पाया। उन्होंने जीवन की समस्या के उत्तर शास्त्र से नहीं दिए, विश्लेषण की प्रक्रिया से दिए।
ओशो

Jay Bheem to all.
24/01/2016

Jay Bheem to all.

उचित लोग विवाद करते हैं, वे जल्दी से फिर से एक साथ शामिल हो जाते हैं।,कभी नष्ट न होने, एक मजबूत, बंधन बना लेते हैं। केवल...
22/01/2016

उचित लोग विवाद करते हैं, वे जल्दी से फिर से एक साथ शामिल हो जाते हैं।,कभी नष्ट न होने, एक मजबूत, बंधन बना लेते हैं। केवल मूर्ख लोग, टूटे कटोरे की तरह ही, एक नहीं होते ।
If good people quarrel, they should quickly join together again, Making a strong , undecaying bond .Only fools, like broken bowls, Do not come to a settlement.

Buddha's Teaching – The Way to SalvationDuring the course of meditation, Gautam Buddha after attaining the enlightenment...
17/01/2016

Buddha's Teaching – The Way to Salvation
During the course of meditation, Gautam Buddha after attaining the enlightenment came out with the certain principles which have become the pillars of Buddhism. These teachings have also become the guidelines for the followers of Buddha. These principles can broadly be explained under the following categories.

1. The Four Noble Truths
The teachings of Buddha can be summarized under the category of Four Noble Truths which are as under:

a) Suffering is common - Birth, Sickness, Old age, Death etc.

b) Cause of Suffering - ignorance and greed.

c) End of Suffering – to cut off greed and ignorance.

d) Path to end Suffering - the Noble Eightfold Path is the way to end suffering.

2. The Noble Eightfold Path
The teachings of Buddha goes round and round like a great wheel that never stops, leading to the central point of the wheel, the only point which is fixed, Nirvana. The eight spokes on the wheel represent the eight parts of the Noble Eightfold Path which are as follows: 1) Right View; 2) Right Thought; 3) Right Speech; 4) Right Conduct; 5) Right Livelihood; 6) Right Effort; 7) Right Mindfulness; 8) Right Concentration.
Thanks to all.
— feeling happy.

नया साल मुबारक।हम अपने आप को ईसाई, बौद्ध, मुस्लिम, हिंदू, या अन्य धर्मशास्त्रसे पुकारने से पहिले,कैसे मानव पहले होना।सीख...
16/01/2016

नया साल मुबारक।
हम अपने आप को ईसाई, बौद्ध, मुस्लिम, हिंदू, या अन्य धर्मशास्त्रसे पुकारने से पहिले,
कैसे मानव पहले होना।सीख ले।
Happy New Year.
Before we call ourselves Christian, Buddhist, Muslim, Hindu, or other theology.
Let us learn how to be human first.
Thanks to all.

Wish you all very Happy New year, 2016.वहाँ दो प्रकार के सुख, मानसिक सुख और बाहरी सुख हैं। बाहरी खुशी से एक बाहरी वस्तु ...
16/01/2016

Wish you all very Happy New year, 2016.वहाँ दो प्रकार के सुख, मानसिक सुख और बाहरी सुख हैं। बाहरी खुशी से एक बाहरी वस्तु के साथ बैठक के माध्यम से आता है, और क्षणभंगुर है। के बारे में ध्यान और सकारात्मक सोच के माध्यम से मानसिक सुख आता है, यह स्थिर है और दुख का कारण नहीं है। एक बाहरी समस्याओं से अप्रभावित है तो एक मानसिक सुख कैसे प्रचुर मात्रा में बाहरी सुख के बाहरी स्रोतों कर रहे हैं, लेकिन मन यदि एक लोगों में सही मायने में खुश है, कोई बात नहीं, अगर नहीं है एक खुश हो नहीं कर सकता। -वेंचर. There are two kinds of happiness,
mental happiness and outer
happiness. Outer happiness comes
through meeting with an external
object, and is transitory. Mental
happiness comes about through
meditation and positive thought, it is
stable and does not cause
Suffering .One cannot be happy if one
does not have mental happiness, no
matter how abundant the external
sources of outer happiness are, but if
one is truly happy in ones mind, then
one is unaffected by outer problems.

I like youI love you..दोनों में क्या अंतर है?इसका सबसे सुन्दर जवाब गौतम बुद्ध ने दिया है:अगर तुम एक फूल को like करते हो ...
16/01/2016

I like you
I love you..
दोनों में क्या अंतर है?
इसका सबसे सुन्दर जवाब गौतम बुद्ध ने दिया है:
अगर तुम एक फूल को like करते हो तो तुम उसे तोड़कर रखना चाहोगे।
लेकिन अगर उस फूल से love करते हो तो तोड़ने के बजाय तुम रोज उसमे पानी डालोगे ताकि फूल मुरझाने न पाए।
जिसने भी इस रहस्य को समझ लिया उसने समझो पूरी जिंदगी को ही समझ लिया।
I like you
I love you..What is the difference?
The most beautiful answer is given by Gautama Buddha:
If you like one flower then you want to keep breaking him.
But if you love that flower then instead of breaking, you poured
water everyday in order not to fade the flower
Who have understood this secret he treat the entire life understood.

"जागरूकता के लिए अपना जीवन समर्पित करे और अपने विचारों की रक्षा विवेक बुद्धि के माध्यम से करे। ... बुद्ध। "Dedicate your...
30/12/2015

"जागरूकता के लिए अपना जीवन समर्पित करे और अपने विचारों की रक्षा विवेक बुद्धि के माध्यम से करे। ... बुद्ध। "Dedicate your lives to awareness and protect your thoughts through mindfulness." ----Buddha.

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